Sunday, March 2, 2008


प्यार तुम्से इस क़द्दर अब हो चुका अब कोई रास्ता नहीं तेरे बीना मेरे दील की हालातों पे गौर कर तू नहीं तो कुछ नहीं तेरे सीवा अब तो आजा जान याद आती है तू बेबसी है दील को तद्पातीहै तू थक के ऑंखें चूर हैं आहट तो कर दील का दरवाजा खुला है आ भी जा क्या हुआ ऐसा की कोई न खब्बर न तेरा ख़त न कोई तेरी नज्ज़र क्या खफा हैं जान मेरी मुझसे ही गर है ऐसा तो बता तू है कीधर चीर कर रख देने दील जाने जीगर इससे ज्यादा अब न मेरा हौंसला उम्र भर लीखेंगे बस तू आ भी जा बाहों में भर लेंगे अब तो आ भी जा प्यार साचा है मेरा ओ दील रुबा रात ढलती है न होती है सुभाह मेरे अफ्सानों की खातिर लौट आ अपने दीवाने की खातिर लौट आ छिप गयी है तू कहाँ मुझको बता ए मेरी जाने जहाँ तू है कहाँ